बेनीवाल जाट जाति (Beniwal) की उत्पत्ति कहां से हुई ?

बेनीवाल जाट गोत्र है जो मुख्यतः राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश में निवास करते हैं।

Beniwal Caste

बेनीवाल जाट जाति की उत्पत्ति कहां से हुई ?

मूल रूप से, सभी बेनीवाल हिंदू थे, और बाद में, उनमें से कुछ ने 1700 सीई के आसपास सिख धर्म का पालन करना शुरू कर दिया, जबकि कुछ इस्लाम (पाकिस्तान) के अनुयायी बन गए।

सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण, वे सभी जाट हैं और एक बड़े परिवार का हिस्सा हैं। सभी बेनीवाल/बेहनीवाल/वाहनीवाल/बनीवाल आदि।

बेनीवाल जाट और बिश्नोई गोत्र है ?

बेनीवाल जाट गोत्र जाटों के प्रमुख गोत्रों में गिना जाता है। बेनीवाल को इतिहास व अलग अलग स्थानों पर अलग अलग नाम से उच्चारण किया गया है जैसे कि वेणिवाल, वेनवाल, बेन्हीवाल, वैनीवाल, बैनीवाल, बहिनवार, वेनीवाल, बेनीवाल कहा गया है।
यह गोत्र काफी प्राचीन गोत्र है।

कहते है कि शुरू के प्रमुख गोत्रों में एक गोत्र बेनीवाल भी था। बेनीवाल को जाटू भाषा में बहिनवार बोला जाता है बेनीवाल गोत्र से दो और जाट गोत्र निकले है मटोरिया और घडास। आपको बता दें कि पंजाब में बेनीवाल को बेनीपाल बोला जाता है।

बेनीवाल जाति का इतिहास

पहले वे मध्य एशिया में थे और वहां से वे भारत में उत्तरी नमक-सीमा वाले पंजाब क्षेत्र में चले गए और 326 ईसा पूर्व में पंजाब पर सिकंदर के आक्रमण के समय। वे सिकंदर महान के साथ लड़े। बाद में बेनीवाल सिहाग, पुनिया, गोदारा, सारण और जोहिया के साथ उत्तर राजस्थान क्षेत्र में चले गए, जिसे जंगलदेश के नाम से जाना जाता है और 15 वीं शताब्दी तक वहां शासन किया।

प्लिनी के बेने: प्लिनी द्वारा उनका उल्लेख बेने के रूप में किया गया है, साथ में ब्रायसैथे आधुनिक बेनीवाल और वारिश जाट भी हैं। वे बहुत प्राचीन लोग हैं और मध्य एशिया में उन्हें वेन या बेन के नाम से पुकारा जाता था। मध्य एशियाई इतिहास में उनका अक्सर उल्लेख किया जाता है।

बी एस दहिया का वेन/वेन/बैन: भीम सिंह दहिया दसवीं शताब्दी ईसा पूर्व में तुर्की में वैन झील पर वेन के राज्य के बारे में लिखते हैं। वे बाद के यूनानी लेखकों, भारत में जाटों के बेनीवाल या वेन्हवाल कबीले के बेने हैं, जिनके राजा, राजा चक्रवर्ती बेन/वेन।

पंजाब से लेकर बंगाल तक भारतीय किंवदंतियों में प्रसिद्ध है, वर्तमान इतिहास में कोई जगह नहीं है। गौरतलब है कि वेन राजाओं ने “राजाओं के राजा”, “दुनिया के राजा” की उपाधि धारण की थी – जो बाद में ईरान के आचमेनियों द्वारा ली गई थीं।

इसके अलावा, वेन राजाओं को “बियानस का राजा” और “नायर का राजा” कहा जाता है। इन उपाधियों से पता चलता है कि वेन साम्राज्य में जाटों के बैंस और नारा वंश शामिल थे। फिर से, वेन राजाओं ने मन्ना/मन्नई और दयानी/दही लोगों पर अपनी शक्ति बढ़ा दी

गनौर की ओर सोनीपत के पास मीना माजरा नाम का एक गाँव, जिसमें बहुमंजिला इमारतों सहित प्राचीन खंडहर हैं। साइट के पास कुछ प्राचीन मंदिर और एक बड़ा तालाब और देवी हैं। स्थानीय लोगों का मानना ​​है कि यह प्राचीन शहर राजा चकवा बेन की राजधानी थी। इस शासक चकवा बेन की पहचान इतिहासकारों को ज्ञात नहीं है।

हालाँकि केसरिया के पास एक स्तूप, जिसे राजा बेन चक्रवर्ती के नाम से जाना जाता है, को ह्वेन-त्सांग ने चक्रवर्ती राजाओं के स्मारक के रूप में उतारा है। कार्लाइल ने बैराट (जयपुर) से एक समान स्थानीय परंपरा को नोट किया, और वहां भी, नाम चकवा बेन है।

कनिंघम ने बिहार, अवध और रूहेल खंड में चक्रवर्ती बेन की इसी तरह की किंवदंतियों का उल्लेख किया है। कार्लाइल कहते हैं, वह एक इंडो-सीथियन राजा था। वह सही है। राजा बेन या बेनीवाल वंश का था। जंगलदेश क्षेत्र में: शिव के ताले से उनकी उत्पत्ति के दर्शन से संकेत मिलता है कि वे नागवंश के हैं। उन्हें शिव (शिवी) गोत्र का माना जाता है।

शिवी और तक्षक पड़ोसी थे। सिकंदर के हमले के बाद शिवी और तक्षक लोग पंजाब चले गए और जंगलदेश पर कब्जा कर लिया। बेनीवाल गोत्र जाट जंगलदेश के कुछ हिस्सों पर कब्जा करने वालों में से एक थे।

जंगलदेश क्षेत्र बीकानेर रियासत के साथ मेल खाता था। वे ईसाई युग के शुरुआती दौर में यहां पहुंचे और 15 वीं शताब्दी तक शासन किया जब राठौरों ने उस समय जाटों में एकता की कमी के कारण जंगलदेश पर कब्जा कर लिया था।

Godara Caste की उत्पत्ति और इतिहास

जंगलदेश में बेनीवाल गणराज्य के तहत 150 गाँव थे, जिनकी राजधानी रायसलाना और भुकरखो, संदुरी, मनोहरपुर, कूई, बाए जैसे जिलों में थी। राजा “असुरबनिपाल” की पहचान जो बेबिलोनिया (ईरान, इराक, इराक) के महान राजा थे।

कुछ दार्शनिकों के अनुसार पुराने समय में भारत के बेनीवाल गोत्र से भी सिरिया आदि ग्रहण किया गया था। जाटों के बीच एकता की कमी ने 15वीं शताब्दी में जंगलदेश में अपना शासन फैलाया था। उस समय जंगलदेश क्षेत्र के लगभग 150 गांवों पर बेनीवाल जाट शासन कर रहे थे।

उनकी राजधानी “राय सेलाना” थी और उनका राजा रायसल था। रायसल एक सरल और बहादुर शासक था। उनके क्षेत्र में बुकेरको, सौंदरी, मनोहरपुर, कूई और बाई जैसे महत्वपूर्ण शहर शामिल थे। लड़ाई बेनीवाल और गोदारा के बीच हो गई थी।

गोदारा जाटों ने राठौरों के साथ गठबंधन किया था। लेकिन बेनीवाल ने हार नहीं मानी और वे लंबे समय तक लड़ते रहे। इसलिए बेनीवाल को योद्धा जाट के रूप में जाना जाता है। लेकिन जाटों के बीच एकता की कमी के कारण उनका क्षेत्र भी समाप्त हो जाता है।

बेनीवाल ने राजा मोहम्मद गौरी (मुस्लिम राजा) के खिलाफ जाटों के युद्ध में भी मुख्य भूमिका निभाई थी। राम स्वरूप जून के बारे में लिखते हैं बेनीवाल गोत्र रेगिस्तानी क्षेत्रों में बड़ी संख्या में पाए जाते हैं। वे खुद को शावि का वंशज बताते हैं और शिव को अपना भगवान मानते हैं।

बीकानेर राज्य की स्थापना से पहले उनका वहाँ एक छोटा सा राज्य था। आजादी से पहले बहावलपुर राज्य में बेनीवाल जाटों के 35 गांव थे और बीकानेर राज्य में इतनी ही संख्या में थे। उत्तरार्द्ध वैष्णव आस्था के अनुयायी हैं।

बेनीसागर भारत के झारखंड राज्य के पश्चिमी सिंहभूम जिले के मांझगाँव ब्लॉक में एक प्राचीन ऐतिहासिक गाँव है। सिंहभूम जिले से कई आयरन स्लैग, माइक्रोलिथ, पॉटशर्ड की खोज की गई है जो कार्बन डेटिंग युग के अनुसार 1400 ईसा पूर्व से हैं।

साहू जाती के गोत्र, इतिहास और जनसख्या

अगर बेनीवाल जाटों की संख्या की बात की जाए तो जानकारी के अनुसार यह जाटों में दूसरे या तीसरे स्थान पर है जबकि पहले स्थान पर पुनिया गोत्र का नाम लिया जाता है। अगर इस गोत्र के इतिहास के बारे में विचार करें तो हम पाते है कि यह गोत्र 700 ई पू प्लिनी में भी मिलता है।

इसमें लिखा पाया जाता है कि उस समय इनको बेनई के रूप में जाना जाता था तथा वाल एक प्रत्यय है तैतीय एवं सतपथ ब्राह्मण तथा कान्ठक सहित इस दावे को सिद्ध करते हैं कि यह आर्याव्रत के प्राचीन गोत्रों में से एक है। भारत एक कृषि प्रधान देश है व जाटों का मुख्य कार्य क्षत्रिय व कृषि ही हुआ है।

बेनीवाल गोत्र के पूर्व भी एक कृषि विशेषज्ञ था जो कि वेन पुत्र था। इसका नाम था पृथ्थू। यही राजा पृथ्वी का प्रथम प्रतिष्ठित राजा हुआ। इसकी 25 पीढियों के बाद वें द्वितीय राजा हुआ। वैन बैन द्वितीय ही नागवंशियों का प्रथम तथा कुल 6 चकवों में से एक चकवा था। यही महाराजा चकवा वैन के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

अनुमान है कि यह महाभारत के समय से बहुत पहले हुआ था इसी के नाम से वर्तमान बेनीवाल गोत्र प्रारंभ हुआ महाराजा चकवा वैन का एक किला शेरशाह सूरी मार्ग पर गन्नौर से 8 किलोमीटर दूरी पर है। जाटों के जो वंश ई पू सैंकडों वर्ष पहले हरिवर्ष गए थे।

आपको बता दें कि आज हम हरिवर्ष को यूरोप के नाम से जानते हैं। हरिवर्ष गए हुए लोगों में एक वैन या बैन भी था इनके राज्य डेनमार्क, इंग्लैंड, अमीर्निया, टर्की आदि देशों में रहे तथा ये लोग आज ईसाई धर्म का पालन करते हैं बीकानेर क्षेत्र में 250 गांवों पर इनका राज्य था।

भादरा जिला हनुमानगढ में आज भी इस गोत्र के लोग काफी संख्या में मिलते है। जबकि इतिहास में हमें बिहार, अवध, रूहेल खंड में भी चकवा वैन के प्रमाण मिले है। टर्की, आर्मीनिया आदि देशों में वैन बैन के नाम की अति प्राचीन झीलें हैं।

रूस और डेनमार्क में भी इनके प्रमाण मिले है जबकि बेबिलोनिया के देशों पर हुकूमत करने वाले महान राजा असुरबेनिपाल को भी कुछ इतिहासकारों ने बेनिवाल जाट ही माना है। अगर हम इनकी संख्या की बात करें तो राजस्थान में एक गोत्र के आधार पर इसी गोत्र की जनसंख्या सर्वाधिक है।

हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल, बिहार में भी इस गोत्र के लोग मिलते है। जबकि कुछ इतिहासकारों ने इनकी उत्तपति शिव भगवान से मानी है । बेनीवाल जाटों के अराध्य देव शिव हैं। बेणीवाल नागवंश से संबंध रखता है।

बेणी सिर के बालों के गुच्छे को कहते हैं। महादेव की जटाओं से जाटों के पैदा होने की जो फिलासफी है उसके अनुसार वे शिव गोत्री अथवा नागवंशी ही हो सकते हैं। बीकानेर के अलावा पंजाब और संयुक्त प्रदेश में भी इनकी आबादी पाई जाती है।

ये लोग जांगल के उस भाग के शासक थे, जो अन्य लोगों के राज्यों से कहीं अधिक उपजाउ था । जाटों के गं्रन्थों में इनके दान की और ठाट बाट की खूब प्रशंसा कही गई है। बेनीवाल जाटों की अपनी खाप भी है।

आपको बता दें कि जाटों की गोत्र हजारों की संख्या में है लेकिन कुछ ही गोत्रों की अपनी खाप पंचायते है जिसमें बेनीवाल खाप भी है। वहीं अगर एक अन्य इतिहासकार के लेखों तो हम पाते है कि राठौरों से जिस समय अपने राज्य की रक्षा के लिए बेणीवाल जाटवीरों का संघर्ष हुआ, उस समय उनके पास 84 गांव थे।

कुछ इतिहासकार बताते है कि बीकानेर क्षेत्र में 250 गांवों पर इनका राज्य था जबकि कुछ इतिहासकारों ने इनकी संख्या 360 बताई हैं । भादरा जिला हनुमानगढ में आज भी यह गोत्र की बहुतायत में पाया जाता है। बीकानेर के अलावा पंजाब और संयुक्त प्रदेश में भी इनकी आबादी अच्छी खासी संख्या में पाई जाती है।

अगर इतिहास में छांक कर हम देखे तो पता चलता है कि बीकानेर राज की और से उनके मुखियाओं के लिए पोशाक सालाना 500 रूपए और 75 रूपये की नदकार बंधी का पता चलता है। बेणीवाल लोगों के पास अन्य राज्यों के लोगों से कहीं अधिक उपजाउ थी। बीकानेर में जाटों की एकता की कमी के कारण इनका राज्य राठौडों ने हथिया लिया था।

लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि बेनीवाल जाटों के कितने गांव थे क्योंकि सभी इतिहासकारों के अलग अलग मत है। कुछ इतिहास कारों ने कहा कि इनकी संख्या 84 थी तो कुछ ने 40 बताई है जबकि एक अन्य इतिहासकार ने इनकी संख्या 150 दी है।

इसके अलावा भी एक अन्य इतिहासकार ने इनकी संख्या 360 गांवों की बताई हैं। अब अगर हम बात करें बेनीवाल खाप की तो बेनीवाल खाप में चूरू, जयपुर और मथुरा में 360 गांव आते हैं। जबकि बेनीवार खाप में 12 गांव आते हैं।

साहू जाती की जनसख्या और इतिहास